*माफ़ी चाहता हूँ*
मैं मर्द हूँ, संवेदनहीन हूँ, ये मेरे लिए कठिन है,
फिर भी मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
इन सैकड़ो नज़रों के सामने जो तुम्हें घूरती हैं देर तलक,
इन सबके सामने जो तुम्हें पाने की रखते हैं ललक,
मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
हर उस पल के लिए, हर उस क्षण हर उस घड़ी के लिए,
जब दूभर हो गया था तुम्हारा सडको पर अकेले निकलना,
हर उस बार के लिए जब तुम्हें पड़ा था खुदसे ही डरना,
हर बार जब मेरे कारण, तुमने खुदको ही धिक्कारा,
हर बार जब तुम घबराईं, मिला ना कोई सहारा,
हर उस बार के लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ।
ट्रेनों में, बसों में, राह चलते सड़कों पे,
जब तुम्हारे जिस्म पर काँटों से रेंगते रहे मेरे वो एहसास,
धक्कों के बहाने जो तुम्हारी आत्मा में चुभती रही जो फाँस,
हर उस बार जब शर्म और गुस्से से झुक गईं तुम्हारी नज़रें,
हर बार जब मेरी बेशर्म सी हंसी से तुम्हारे रोम-रोम सुन्न पड़े,
जब तुम्हें अपने जिस्म से, अपने लड़की होने पर घृणा होने लगी,
हर बार जब तुम्हारे बाहर निकलने पर माँ की आँखें अश्रु से भरीं,
उस हर बार के लिए मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
और इस माफ़ी के बाद एक वादा तुमसे भी चाहता हूँ,
कि अगली बार जब तुम मुझसे मिलो तो बिल्कुल ना घबराना,
हर बार जो डर से झुकती आईं हैं नज़रें, इनको गर्व से उठाना।
मैं तुम्हें फिर से रोकूंगा, फिर से तुम्हारे डर को अन्दर तक कुरेदुंगा।
फिर से अपने भयावही हाथों को तुम्हारे करीब ले जाने की कोशिश करूँगा,
तुम्हारी आत्मा को झकझोरुंगा, शायद तुम्हारा मन टूटने लगे,
पर तुम इसे मज़बूत करना, बांधना हिम्मत को गर वो छूटने लगे,
मेरा सामना करना, मेरी आँखों में आँखे डालकर मेरी आत्मा को नोच लेना,
मेरे अन्दर के राक्षस से डरना नहीं, वो बहुत कमज़ोर है, उसे मात देना,
मेरे अन्दर के इन्सान को ढूँढने की कोशिश करना, उसे नींद से जगाना।
सोया पड़ा है बरसों से, मेरे अन्दर भी एक डर है, उसे दूर भगाना,
मेरा डट कर सामना करना, और यकीन मानो, मैं दूर भाग जाऊंगा,
तुम्हारी हिम्मत के सामने कमज़ोर हूँ, देखना तुम जीत जाओगी और मैं हार जाऊंगा।
मैं मर्द हूँ, संवेदनहीन हूँ, ये मेरे लिए कठिन है,
फिर भी मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
-ऋषभ गोयल
मैं मर्द हूँ, संवेदनहीन हूँ, ये मेरे लिए कठिन है,
फिर भी मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
इन सैकड़ो नज़रों के सामने जो तुम्हें घूरती हैं देर तलक,
इन सबके सामने जो तुम्हें पाने की रखते हैं ललक,
मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
हर उस पल के लिए, हर उस क्षण हर उस घड़ी के लिए,
जब दूभर हो गया था तुम्हारा सडको पर अकेले निकलना,
हर उस बार के लिए जब तुम्हें पड़ा था खुदसे ही डरना,
हर बार जब मेरे कारण, तुमने खुदको ही धिक्कारा,
हर बार जब तुम घबराईं, मिला ना कोई सहारा,
हर उस बार के लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ।
ट्रेनों में, बसों में, राह चलते सड़कों पे,
जब तुम्हारे जिस्म पर काँटों से रेंगते रहे मेरे वो एहसास,
धक्कों के बहाने जो तुम्हारी आत्मा में चुभती रही जो फाँस,
हर उस बार जब शर्म और गुस्से से झुक गईं तुम्हारी नज़रें,
हर बार जब मेरी बेशर्म सी हंसी से तुम्हारे रोम-रोम सुन्न पड़े,
जब तुम्हें अपने जिस्म से, अपने लड़की होने पर घृणा होने लगी,
हर बार जब तुम्हारे बाहर निकलने पर माँ की आँखें अश्रु से भरीं,
उस हर बार के लिए मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
और इस माफ़ी के बाद एक वादा तुमसे भी चाहता हूँ,
कि अगली बार जब तुम मुझसे मिलो तो बिल्कुल ना घबराना,
हर बार जो डर से झुकती आईं हैं नज़रें, इनको गर्व से उठाना।
मैं तुम्हें फिर से रोकूंगा, फिर से तुम्हारे डर को अन्दर तक कुरेदुंगा।
फिर से अपने भयावही हाथों को तुम्हारे करीब ले जाने की कोशिश करूँगा,
तुम्हारी आत्मा को झकझोरुंगा, शायद तुम्हारा मन टूटने लगे,
पर तुम इसे मज़बूत करना, बांधना हिम्मत को गर वो छूटने लगे,
मेरा सामना करना, मेरी आँखों में आँखे डालकर मेरी आत्मा को नोच लेना,
मेरे अन्दर के राक्षस से डरना नहीं, वो बहुत कमज़ोर है, उसे मात देना,
मेरे अन्दर के इन्सान को ढूँढने की कोशिश करना, उसे नींद से जगाना।
सोया पड़ा है बरसों से, मेरे अन्दर भी एक डर है, उसे दूर भगाना,
मेरा डट कर सामना करना, और यकीन मानो, मैं दूर भाग जाऊंगा,
तुम्हारी हिम्मत के सामने कमज़ोर हूँ, देखना तुम जीत जाओगी और मैं हार जाऊंगा।
मैं मर्द हूँ, संवेदनहीन हूँ, ये मेरे लिए कठिन है,
फिर भी मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूँ।
-ऋषभ गोयल
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